भूगोल से सम्बन्धित
(अवधिया जी की साईट से साभार )
- भूगोल के जनक – हिकेटियस
- भौतिक भूगोल के जनक – पोलीडोनियस
- सांस्कृतिक भूगोल के जनक – कार्ल ओ सावर
- सांस्कृतिक भूगोल के प्रथम लेखक – कार्ल ओ सावर
- वर्तमान भूगोल के जनक – अलेक्जेण्डर वॉन हम्बोल्ट
- ज्योग्रफी शब्द के प्रथम प्रस्तावक – इरेटॉस्थेनीज
- गणितीय भूगोल के संस्थापक - थेल्स तथा एनेक्सीसीण्डर
- विश्व ग्लोब के निर्माता – मार्टिन बैहम
- विश्व मानचित्र के निर्माणकर्ता – अनेग्जी मेण्डर
- भौगोलिक विश्वकोष के रचनाकार – स्ट्राबो
- वातावरणवाद के प्रणेता – हेरोडोटस
- प्रादेशिक भूगोल के प्रथम अध्ययनकर्ता – हर्बर्सटन
- मॉडल संकल्पना के जनक - पीटर हैगेट
इतिहास और भूगोल का बड़ा गहरा सम्बन्ध है क्योंकि भूगोल का इतिहास पर अनेक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ते हैं। इसीलिए किसी भी देश के इतिहास का अध्ययन उसके भौगोलिक अध्ययन के बगैर अपूर्ण होता है। भारत के इतिहास के अध्ययन के लिए भी इसके भौगोलिक पृष्ठभूमि का ज्ञान होना आवश्यक है।
उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला-उपमहाद्वीप हिन्दुओं में ‘भारतवर्ष’ के नाम से जाना जाता है। भारतवर्ष नामकरण ऋग्वैदिक काल के प्रमुख राजा भरत के नाम पर किया गया था। लोगों का एक वर्ग इसे ‘जम्बू द्वीप’ का एक भाग बताते हैं। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य वंश के द्वारा शासित क्षेत्र जम्बू द्वीप कहलाता था। भारत के लिए ‘इण्डिया’ शब्द का प्रयोग यूनानियों के द्वारा हुआ। मध्यकालीन लेखकों ने भारतवर्ष को ‘हिन्द’ या ‘हिन्दुस्तान’ के नाम से सम्बोधित किया है जो कि हिन्दू शब्द से बना है और हिन्दू शब्द की उत्पत्ति भारत की महान नदी सिन्धु से हुई है।
प्राचीन भारतीय साहित्य में भारतवर्ष का भौगोलिक विभाजन 5 भागों में किया गया है जो हैं – उदीव्य (उत्तर), प्राच्य (पूर्व), प्रतीच्य या अपरान्त (पश्चिम) तथा दक्षिणापथ (दक्षिण)।
वर्तमान में भारत को मुख्य भागों में बँटा माना जाता है -
उत्तर के पर्वतीय प्रदेश – तराई के वनों से लेकर हिमालय के शिखर तक का क्षेत्र उत्तर के पर्वतीय प्रदेश के के अन्तर्गत् आता है जिसमें वर्तमान कश्मीर, शिवालिक, टिहरी, कांगड़ा, कुमायूँ, नेपाल, सिक्किम तथा भूटान स्थित हैं। यही पुराणों में उल्लिखित “पर्वतश्रयिण” क्षेत्र है। यह क्षेत्र लगभग 1500 मील लंबा तथा 160 से 200 मील चौड़ा है।
उत्तर का मैदान – यह सिंधु तथा गंगा नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से बना मैदानी क्षेत्र है। इसकी लंबाई लगभग 3200 किलो मीटर तथा औसत चौड़ाई 150 से 3000 किलोमीटर है। यह क्षेत्र अपनी उपजाऊ भूमि और अधिक पैदावार के कारण प्रसिद्ध है तथा इस मैदानी भाग की सिंचाई सिंधु एवं गंगा तथा उनकी सहायक नदियों द्वारा होती है। राजस्थान का मरुस्थलीय प्रदेश भी इसी के अन्तर्गत् आता है।
मध्य भारत का पठार – विन्ध्याचल तथा सतपुड़ा की पर्वतमालाएँ इस क्षेत्र के अन्तर्गत फैली हुई हैं जो भारत को उत्तरी और दक्षिणी भागों में विभक्त करती हैं। इस क्षेत्र की अधिकांश नदियाँ प्रायः शुष्क मौसम में सूख जाती हैं।
तटीय क्षेत्र – यह दक्षिण का लम्बा तथा सँकरा समुद्री मैदानी क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत् कोंकण तथा मालाबार तट के बन्दरगाह स्थित हैं। इसी भाग में कृष्णा, कावेरी तथा गोदावरी के अत्यधिक उपजाऊ डेल्टा भी आते हैं।

भारत के इतिहास पर भूगोल का प्रभाव
भारत उत्तर दिशा में हिमालय तथा अन्य तीन दिशाओं में समुद्र के द्वारा सुरक्षित देश है। यद्यपि हिमालय विदेशी आक्रमणकर्ताओं को रोकने के लिए भारत का ढाल है किन्तु हिमलाय के उत्तर-पश्चिम में स्थित सुलेमान तथा हिन्दुकुश जैसे कम ऊँचे पर्वतों में खैबर, कुर्रम, बोलन आदि जैसे अनेक दर्रे हैं जिनसे होकर ग्रीक, शक, कुषाण, हूण, अरबी, तुर्क, मंगोल, अफगान और मुगल भारत पर आक्रमण करते रहे।
चूँकि सिन्धु और गंगा के मैदान के अत्यधिक उपजाऊ और समृद्धिशाली थे, इसलिए इसी क्षेत्र में बड़े-बड़े साम्राज्यों की स्थापना हुईं। भारत के इस भाग में ही अनेक धार्मिक, दार्शनिक, राजनीतिक और सामाजिक विचारों का प्रादुर्भाव हुआ, इसी क्षेत्र में बौद्ध तथा जैन जैसे धर्मों का विकास हुआ तथा नालंदा, तक्षशिला, सारनाथ जैसे शिक्षा-केन्द्रों की स्थापना हुई। चूँकि इस भू-भाग में संचार माध्यम के रूप में अनेक नदियाँ उपलब्ध थीं, इसलिए इसी क्षेत्र में लाहौर, मुल्तान, दिल्ली, आगरा, पाटलिपुत्र, वाराणसी, प्रयाग जैसे नगरों की स्थापना भी हुई।
शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी के कुरुक्षेत्र से लेकर राजपूताने तक फैले हुए भू-भाग पर, जो कि सतलज तथा यमुना नदियों के मध्य का क्षेत्र है, अधिकार प्राप्त करने के लिए महाभारत तथा पानीपत की महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ीं गईं।
जहाँ उत्तर भारत में आर्य संस्कृति का प्रभाव रहा, वहीं दक्षिण भारत में द्रविड़ संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता रहा। माना जाता है कि दक्षिण भारत में आर्य सभ्यता को अगस्त्य ऋषि लेकर आए और जब भी उत्तर भारत में विदेशी आक्रांताओं ने आर्य संस्कृति को नष्ट किया, दक्षिण भारत में वह आर्य संस्कृति सुरक्षित ही रही। दक्षिण भारत के समुद्र तटों पर स्थित बंदरगाहों में भारत का विदेशी व्यापार भी फलता-फूलता रहा।
पृथ्वी की आयु
पृथ्वी की आयु की गणना करने के लिए उपयुक्त प्रमाणों का सर्वथा अभाव है। प्राचीन भारत की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी की उम्र 2 अरब (20 मिलियन) वर्ष है जो कि वर्तमान वैज्ञानि गणनाओं के निकट है फिर भी हिन्दू गणना का आधार काल्पनिक होने के कारण इसे वैज्ञानिक नहीं माना जाता। विभिन्न मतों के निष्कर्ष के रूप में पृथ्वी की सर्वाधिक मान्य आयु 2.3 अरब वर्ष है जो कि रेडियोएक्टिव्ह पदार्थों से प्रमाणित भी होती है।
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